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Wednesday, 19 August 2015

सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाएं अफसर - जनप्रतिनिधि, नौकरशाह और न्यायाधीशों के बच्चों का सरकारी स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य करे सरकार

  • कान्वेंट में बच्चों को पढ़ाने पर दंडित करने की हो व्यवस्था
  • अहम फैसला
  • मुख्य सचिव छह माह में अमल कराकर दें रिपोर्ट 

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इलाहाबाद : उप्र के प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक बेसिक स्कूलों की दुर्दशा पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त कदम उठाया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक जनप्रतिनिधियों, नौकरशाहों और अन्य उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों, न्यायाधीशों के बच्चे प्राइमरी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे तब तक इन स्कूलों की दशा नहीं सुधरेगी। हाई कोर्ट ने छह माह के भीतर मुख्य सचिव को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया है कि सरकारी, अर्ध सरकारी सेवकों, स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधियों, न्यायपालिका एवं सरकारी खजाने से वेतन, मानदेय या धन प्राप्त करने वाले लोगों के बच्चे अनिवार्य रूप से बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में पढ़ें। ऐसा न करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। यदि कोई कान्वेंट स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भेजे तो उस स्कूल में दी जाने वाली फीस के बराबर धनराशि उसके द्वारा सरकारी खजाने में प्रतिमाह जमा कराई जाए। ऐसे लोगों का इन्क्रीमेंट व प्रोन्नति कुछ समय के लिए रोकने की व्यवस्था हो। कोर्ट ने राज्य सरकार को अगले शिक्षा सत्र से इसे लागू करने को कहा है। यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने शिव कुमार पाठक व कई अन्य की याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया। सरकारी खजाने से वेतन या सुविधा ले रहे बड़े लोगों के बच्चे जब तक अनिवार्य रूप से प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ेंगे, तब तक उनकी दशा में सुधार नहीं होगा। -इलाहाबाद हाई कोर्ट

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